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MOVIE REVIEW: चंबल के डाकुओं और उस समय का सच दिखाती है 'सोनचिड़िया'

करीब 20 साल पहले भिंड जिले (चंबल क्षेत्र) के निवासी एक दोस्त से डकैती फिल्मों पर बात हो रही थी। उसने व्यंग्य से कहा कि हिन्दी फिल्मों में बीहड़ के डाकुओं को घोड़े पर बैठ कर आते-जाते दिखाया जाता है। बॉलीवुड वाले चंबल देख लें, तो उनको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है। डाकुओं के जीवन पर बॉलीवुड में ढेर सारी फिल्में बनी हैं और सफल भी रही हैं। 60 और 70 के दशक में तो ऐसी फिल्मों की भरमार थी। इन फिल्मों ने डाकुओं की छवि जो जनमानस में पेश की, वह सच्चाई से कोसों दूर है। इस प्रचलित छवि को तोड़ने का काम शेखर कपूर निर्देशित ‘बैंडिट क्वीन’ और तिग्मांशु धूलिया निर्देशित ‘पान सिंह तोमर’ ने किया। अभिषेक चौबे निर्देशित ‘सोनचिड़िया’ भी काफी हद तक यह काम करती है।

एक दौर था, जब चंबल के बीहड़ों में डाकुओं का राज चलता था। वे खुद को बागी कहते थे। ‘सोनचिड़िया’ की कहानी भी उसी दौर की है। आकाशवाणी की चिर-परिचित धुन (सिग्नेचर ट्यून) के साथ देश में इमरजेंसी का ऐलान होता है और उसी दिन डाकू मानसिंह उर्फ दद्दा (मनोज बाजपेयी) अपने साथियों लाखन (सुशांत सिंह राजपूत), वकील सिंह (रणवीर शौरी) और दूसरों के साथ एक सुनार को लूटने पहुंचता है। उधर दारोगा वीरेंदर गुज्जर (आशुतोष राणा) के नेतृत्व में पुलिस गांव को घेर लेती है। मानसिंह और कुछ दूसरे डाकू मारे जाते हैं। वकील और लाखन बाकी साथियों के साथ भागने में कामयाब हो जाते हैं। वकील नया सरदार चुना जाता है। रास्ते में उन्हें इन्दुमति (भूमि पेडणेकर) मिलती है, जो एक 12 साल की बच्ची सोनचिड़िया (खुशिया) को अस्पताल में लेकर जा रही होती है। उस बच्ची के साथ इन्दुमति के ससूर ने दुष्कर्म किया था। उसने अपने ससूर को मार दिया था, इसलिए उसके परिवार वाले उसके पीछे पड़े थे। लड़की की जाति को लेकर डाकुओं का गैंग दो भागों में बंट जाता है और लाखन उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए वकील से विद्रोह कर देता है।

पुलिस बागियों के पीछे पड़ी हुई है। वकील का गैंग लाखन के पीछे पड़ा हुआ है। लाखन, बेनीराम (योगेश तिवारी) से मदद मांगने जाता है, लेकिन बेनीराम उससे धोखा कर देता है। लाखन उसे अगवा कर अपने साथ ले जाता है। इस बीच लाखन और उसके दोनों साथी फुलिया यानी फूलन देवी (सम्पा मंडल) के गैंग के हत्थे चढ़ जाते हैं। लाखन, बेनीराम को फूलिया के हवाले करके उससे समझौता करता है। पुलिस फिर बागियों को बीहड़ों में घेर लेती है और मुठभेड़ शुरू हो जाती है। और शुरू होती है सोनचिड़िया को धौलपुर के बड़े अस्पताल में पहुंचाने की जद्दोजहद…
यह फिल्म चंबल के डाकुओं की जिंदगी के बहाने उस समय के जातीय संघर्ष को बड़े प्रभावी तरीके से पेश करती है। नेताओं पर चुटकी लेने से भी बाज नहीं आती। एक सीन में मानसिंह कहता है- ‘सरकारी गोली से कहां कोई मरता है। लोग तो सरकारी वादों से मरते हैं।’ उस समय समाज इस कदर जातीय संघर्ष में बंटा था कि सही, गलत, इंसाफ कुछ मायने नहीं रखता था (हालांकि स्थिति अब भी बहुत बेहतर नहीं है)। डाकुओं से लेकर आम ग्रामीणों, पुलिस, सबमें उसकी छाप साफ देखी जा सकती थी। निर्देशक अभिषेक चौबे ने उस समय के सामाजिक परिदृश्य को बहुत असरदार तरीके से इस फिल्म में पेश किया है। सुदीप शर्मा ने ्क्रिरप्ट पर मेहनत की है। हालांकि अभिषेक ने डाकुओं की वही छवि पेश की है, जो आमतौर पर लोगों के मन में रही है। इन्दुमति कहती है- ‘डाकू भी भले होते हैं’। लेकिन अभिषेक उन्हें वास्तविकता के निकट भी रखते हैं, उनकी जिंदगी की ज्यादा प्रामाणिक तसवीर पेश करते हैं। यही उनकी सफलता है।

फिल्म में कुछ बातें वैसी भी हैं, जैसी बॉलीवुड की मसाला फिल्मों में होती हैं, खासकर क्लाईमैक्स। सिनमेटोग्राफी कमाल की है। अनुज राकेश धवन ने चंबल के रूप, रस, गंध को बहुत शानदार तरीके से पकड़ा है। संवाद भी अच्छे हैं और बनावटी नहीं लगते। फिल्म का यह संवाद- ‘चूहे को खाएगा सांप, सांप को खाएगा गिद्ध, कह गए गए हैं सब साधु सिद्ध’ फिल्म के दर्शन को एक वाक्य में बयां कर देता है। ‘बैरी बेईमान बागी सावधान’ भी याद रह जाने लायक संवाद है। फिल्म की गति पहले हाफ में थोड़ी धीमी है। गालियां भी पर्याप्त मात्रा में हैं, हालांकि वे अस्वाभाविक नहीं लगतीं।

 फिल्म की स्टारकास्ट बेहतरीन है। मनोज बाजपेयी का रोल छोटा है और यह बात अखरती है। फिर भी वह जितने समय पर्दे पर रहते हैं, सबसे ऊपर रहते हैं। सुशांत सिंह राजपूत ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन कुछ जगहों पर वह चूक भी जाते हैं। रणवीर शौरी का अभिनय बेहतरीन है। लंबे समय के बाद उन्हें एक ऐसी फिल्म मिली है, जहां उन्हें अपनी पूरी क्षमता दिखाने का मौका मिला है। भूमि पेडणेकर भी अपने किरदार में जंची हैं, जमी हैं। आशुतोष राणा अपनी पुरानी फॉर्म में नजर आते हैं। वे हर सीन में अपनी छाप छोड़ते हैं। बाकी सहयोगी कलाकारों का अभिनय भी अच्छा है।

यह फिल्म भले ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘पान सिंह तोमर’ के स्तर पर नहीं पहुंच पाती, लेकिन प्रभावित करती है, छाप छोड़ती है। यह एक खास दर्शक वर्ग की फिल्म है। अगर आप चंबल युग के बागियों और उनके उस दौर रूबरू होना चाहते हैं, तो यह फिल्म देख सकते हैं। अच्छी लगेगी। 

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